LEKIN

LEKIN a song by JJ47 on Foxsoundi — Free Music, Smart Streaming for Everyone

LEKIN by JJ47

LEKIN Lyrics

मैं रोज़ सोचूँ दिल की सुनूँ
या फिर करूँ जो भी सही मुझे लगता है यहाँ पर
मैं जैसा एक रास्ते पर चल रहा
ज़िन्दगी ले कर चले जा रही जहाँ पर
कि मंज़िल अब दूर भी लगे
दिल चूर भी लगे
आसानी ना कहाँ पर
हम सीखे सब सीने में रखना
कभी आए कुछ ना कभी भी ज़ुबान पर
मैं किसी से अब लड़ता नहीं हूँ
पर ये भी नहीं कि कभी लड़ नहीं सकता
मैं साथ ले कर चलता हूँ सबको
तो तेरे लिए क्या कुछ कर नहीं सकता
ये रस्म-ओ-रिवाज मेरे बस में ना
मैं रिश्ते पकड़ नहीं सकता
तू झूठ बोले रात तू सुकून में थी
क्या मैं चेहरे पढ़ नहीं सकता
तुझे देख अपने आप को देखता
भीगी हुई रात में शराब को देखता
मैं तुझ में एक अज़ाब को देखता
जैसा गुनहगार शख्स हिसाब को देखता
कांटों में लिपटे गुलाब को देखता
बख़ता हुआ महताब को देखता
तेरी बातों में मेरी ये शाम में गुज़रे
सोया बिना इस ख़्वाब को देखता
तो लोग हार मान आए
और बड़े परेशान आए
अब तेरे शहर चक्कर लगा है
लेकिन बनके अंजान आए
हम तुझसे दिल की बातें करते करते
अक्सर गुमान आए
जो तुम घर
बनके मेहमान आए
तो जान मेरी जान में जान आए
कि तुम भी कभी बैठे बैठे मेरे बारे यूं ही उल्टा सीधा सोचती हो
कि तुम भी कभी कभी कुछ कहने को चाहो
पर बेवजह खुद को ही ठोकती हो
कि तुम भी इसी हाल में हो
कि तुम भी बड़ी बेहाल सी हो
तुम समझ में ना आती हो
तुम ऐसे ही सवाल सी हो
वोह
मैं तेरे लिए गाना लिखूं
गुमान लिखूं
अफसाने लिखूं
अब तो जो लिखने का कह दो
तो अब बेहत सब तेरे सेहराने लिखूं
मैं तुझे कभी अपना लिखूं
कभी सपना लिखूं
कई बहाने लिखूं
तुझे सोच भी नहीं का सोचूं
कि तुझे मैं खाने लिखूं
ये कलम मुझे बोझ लग रही थी
ये कलम मेरी दोस्त बन गई है
जो रातें मुझे काटने की दौड़ती
वो रातें अब जैसे एक मौज बन गई है
अब मेरी किसी सोच बन गई है
कि तो ही मेरी बोझ बन गई है
कि अब तुझे लिखते रहना
ये आदतें अब रोज़ बन गई है
अब मेरे नाम के नारे लगते
ये काम सारे तुम्हारे लगते
लोग ढूंढे मुझे कैसे घर तक पहुंचें
बेचें कोई ख़ूफ़िया आदारे लगते
तू बहती रोज़ अक्सर
शाम में तख्ती जैसे घर को तेरे किनारे लगते
ये लम्हें तुझ पर भारी जैसे
तुम नई दर्द में गुज़रे लगते
वोह
तो लोग हार मान आए
और बड़े परेशान आए
अब तेरे शहर चक्कर लगा है
लेकिन बनके अंजान आए
हम तुझसे दिल की बातें करते करते
अक्सर गुमान आए
जो तुम घर
बनके मेहमान आए
तो जान मेरी जान में जान आए
क्या तुम भी कभी बैठे बैठे मेरे बारे यूं ही उल्टा सीधा सोचती हो
क्या तुम भी कभी कभी कुछ कहने को चाहो
पर बेवजह खुद को ही ठोकती हो
क्या तुम भी इसी हाल में हो
क्या तुम भी बड़ी बेहाल सी हो
तुम समझ में ना आती हो
तुम ऐसे ही सवाल सी हो
वाओ

From the album: JUNE